समुद्र-मंथन से निकले हलाहल विष को शिव ने त्रयोदशी की संध्या में कंठ में धारण किया। देवताओं ने उसी प्रदोष काल में उनकी स्तुति की — तभी से यह समय शिव-पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त माना गया।
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ॐ नमः शिवाय
आरती: ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा — धीमी, गंभीर लय. ऑडियो शीघ्र आ रहा है।
पारण: पूजा व आरती के तुरंत बाद प्रसाद लेकर पारण करें — अगले दिन की प्रतीक्षा नहीं।
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क्षेत्र व परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है। तिथि की पुष्टि अपने पंचांग से करें।