दस पर्चे। सोने का समय तय करने से कुछ नहीं होता — उठने का समय तय कीजिए।
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1 / 10 · सबसे बड़ा लीवर
सोने का नहीं — उठने का समय तय कीजिए
रोज़ एक ही समय पर उठिए। छुट्टी के दिन भी।
सोने के समय पर आपका ज़ोर नहीं चलता — नींद आदेश से नहीं आती। पर उठने का समय आपके हाथ में है, और वही शरीर की घड़ी को बाँधता है।
कुछ दिन यही एक काम कीजिए, और नींद अपने आप पीछे-पीछे आने लगेगी। बाक़ी नौ पर्चे इसी के सहारे हैं।
आयुर्वेद में निद्रा को आहार के साथ जीवन के उपस्तम्भों में गिना गया है — बची हुई चीज़ नहीं, आधार।
2 / 10 · कितनी
सात से नौ घंटे — और बुज़ुर्गों को भी
वयस्क7–9 घंटे
किशोर8–10 घंटे — स्कूल की सुबह इसी से टकराती है
बुज़ुर्ग7–8 घंटे — कम नहीं
“उम्र के साथ नींद कम चाहिए” — यह ग़लत है। बुज़ुर्गों की नींद टूटती ज़्यादा है, ज़रूरत कम नहीं होती। इसे उम्र मानकर छोड़ देना ही असली भूल है।
असली पैमाना घंटे नहीं, दिन है: बिना ज़ोर लगाए दिन कट जाए, तो नींद पूरी है।
छुट्टी के दिन दो-तीन घंटे ज़्यादा सोना पड़े — तो हफ़्ते भर की नींद कम पड़ रही है।
3 / 10 · सबसे ज़रूरी
खर्राटे हमेशा मज़ाक़ की बात नहीं
तेज़ खर्राटों के साथ अगर इनमें से कुछ भी है, तो यह स्लीप ऐप्निया हो सकता है — नींद में साँस बार-बार रुक जाना:
घर वालों ने साँस रुकते देखी हो, या हाँफकर जागना
दिन में बहुत नींद — बैठे-बैठे, या गाड़ी चलाते हुए
सुबह सिरदर्द, मुँह सूखा, गला ख़राब
रात में बार-बार पेशाब; चिड़चिड़ाहट; ध्यान न लगना
साथ में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, या मोटापा
भारत में यह अधिकतर पकड़ में ही नहीं आता — मध्यम से गंभीर श्रेणी के दस में लगभग आठ लोगों की जाँच कभी नहीं होती।
यह सिर्फ़ नींद का मामला नहीं — यह रक्तचाप, शुगर और दिल से जुड़ा है। डॉक्टर से कहिए, “मुझे स्लीप ऐप्निया की जाँच करानी है।”
4 / 10 · चाय
शाम की चाय — असली हिसाब
कैफ़ीन का आधा जीवन लगभग पाँच घंटे है। यानी शाम छह बजे की चाय का आधा असर ग्यारह बजे तक बैठा रहता है।
6 घंटे पहले ली कॉफ़ी ने नींद 1 घंटे से ज़्यादा घटा दी।
और सबसे काम की बात यह है कि पीने वालों को पता ही नहीं चला — उन्हें लगा नींद ठीक थी। मशीन ने बताया कि नहीं थी।
दोपहर बाद की चाय दो हफ़्ते घटाकर देखिए। अगर नींद सुधरे, तो जवाब मिल गया — बिना किसी दवा के।
5 / 10 · शराब
शराब नींद देती नहीं, उधार देती है
नींद जल्दी आ जाती है — यह सच है, और यही धोखा है। रात का पहला हिस्सा गहरा लगता है।
फिर शरीर शराब पचाता है, और दूसरे हिस्से में नींद टूटने लगती है: बार-बार जागना, सपनों वाली नींद का उखड़ना, और तड़के तीन-चार बजे आँख खुल जाना जो फिर लगती नहीं।
यह कम मात्रा में भी होता है, और सोने के जितना क़रीब पिएँ उतना ज़्यादा।
जो लोग “नींद के लिए” पीते हैं, वे अक्सर उसी वजह से आधी रात को जाग रहे होते हैं।
6 / 10 · बीस मिनट
नींद न आए तो बिस्तर छोड़ दीजिए
क़रीब बीस मिनट जागे पड़े रहें तो उठ जाइए। दूसरे कमरे में मद्धम रोशनी में बैठिए, कुछ सादा पढ़िए, और नींद आने पर ही लौटिए।
वजह सीधी है: बिस्तर पर घंटों करवट बदलने से दिमाग़ सीखता है कि बिस्तर = जागना। यही आदत टूटनी है।
बिस्तर सिर्फ़ सोने के लिए — फ़ोन, दफ़्तर, झगड़ा नहीं
घड़ी मत देखिए। समय देखने से बेचैनी बढ़ती है, नींद नहीं आती
घड़ी या फ़ोन का मुँह दीवार की तरफ़ कर दीजिए
यह अजीब लगता है और काम करता है। यही उन तरीक़ों में से एक है जिन्हें डॉक्टर सबसे पहले आज़माने को कहते हैं।
7 / 10 · रोशनी
सुबह की धूप, रात का अंधेरा
शरीर की घड़ी रोशनी से चलती है। उठने के बाद दस-पंद्रह मिनट धूप — छत, बालकनी, या टहलते हुए — घड़ी को सबसे मज़बूती से बाँधती है।
रात में उल्टा: रोशनी मद्धम, कमरा अंधेरा और ठंडा।
और फ़ोन के बारे में ईमानदार बात — दिक़्क़त सिर्फ़ नीली रोशनी नहीं है। असली दिक़्क़त यह है कि फ़ोन समय खा जाता है और दिमाग़ जगा देता है। रील और ख़बरें जितना जगाती हैं, उतना कोई बल्ब नहीं।
सोने से एक घंटा पहले फ़ोन दूसरे कमरे में चार्ज कीजिए। अलार्म के लिए सस्ती घड़ी काफ़ी है।
8 / 10 · दिन की झपकी
झपकी छोटी और जल्दी
20–30 मिनट, और तीन बजे से पहले। इतनी झपकी ताज़ा करती है और रात की नींद नहीं छीनती।
लंबी या देर की झपकी रात का दबाव ख़त्म कर देती है — फिर रात को नींद न आना आपकी नहीं, दोपहर की ग़लती है।
आयुर्वेद भी दिवास्वप्न को आमतौर पर मना करता है, पर गरमी के दिनों में, और बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों व बहुत थके हुए लोगों के लिए छूट देता है। यह वही बात है, दूसरे शब्दों में।
रात की नींद ठीक हो तो झपकी की ज़रूरत ही कम पड़ती है। रोज़ झपकी चाहिए, तो सवाल रात का है।
9 / 10 · गोली से पहले
लंबी अनिद्रा में पहली दवा गोली नहीं है
दुनिया भर के दिशानिर्देश पहले व्यवहार-आधारित उपचार की सलाह देते हैं — यानी पर्चा 1, 6 और 7 वाली बातें, किसी जानकार की देखरेख में।
इसमें दस में सात-आठ लोगों की नींद सुधरती है, और सुधार गोली से अधिक टिकाऊ रहता है, क्योंकि आदत बदलती है, रसायन नहीं।
नींद की गोलियाँ आमतौर पर चार-पाँच हफ़्ते से ज़्यादा के लिए नहीं मानी जातीं
बुज़ुर्गों में ये गिरने और हड्डी टूटने का ख़तरा बढ़ाती हैं
अचानक बंद करने पर नींद पहले से बिगड़ सकती है
न अपने मन से शुरू कीजिए, न अपने मन से बंद। जो चल रही है, उसे डॉक्टर के साथ बैठकर घटाइए।
10 / 10 · आज
आज रात से चार काम
कल उठने का एक समय तय कीजिए — और हफ़्ते भर वही
दोपहर बाद चाय-कॉफ़ी बंद
फ़ोन दूसरे कमरे में चार्ज होगा
नींद न आए तो बीस मिनट बाद उठ जाइए
नींद पीछा करने से नहीं आती। जगह बनाने से आती है।
यह पन्ना उस घर में भेजिए जहाँ किसी के खर्राटे सब सुनते हैं और कोई कुछ करता नहीं।
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यह चिकित्सा सलाह नहीं है। दिन में गाड़ी चलाते या काम करते हुए नींद आना, नींद में साँस रुकना, या लगातार कई हफ़्तों की अनिद्रा — इनमें डॉक्टर को दिखाइए। नींद की चल रही कोई भी दवा अपने मन से बंद न करें। नींद का लगातार बिगड़ना अवसाद, चिंता, थायरॉयड या दर्द का संकेत भी हो सकता है, और उनका इलाज अलग होता है।