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भाद्रपद पूर्णिमा और पितृपक्ष — पूरी विधि

दस पर्चे। पूर्णिमा की पूजा, और उसी शाम से सोलह दिन के पितृपक्ष की विधि — तर्पण से सर्व पितृ अमावस्या तक।

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1 / 10 · परिचय

भाद्रपद पूर्णिमा — 26 सितंबर 2026

पितृपक्ष डर का नहीं, स्मरण का है।

पूर्णिमा को स्नान-दान और सत्यनारायण कथा; और उसी शाम से पितृपक्ष — 26 सितंबर से 10 अक्टूबर, सर्व पितृ अमावस्या तक।

पूर्णिमा के दिन का श्राद्ध उनके लिए है जिनका देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ।
2 / 10 · पूर्णिमा

पूर्णिमा की विधि

  • प्रातः पवित्र स्नान, व्रत का संकल्प
  • चौकी पर केले के पत्तों का मंडप; विष्णु-प्रतिमा और कलश
  • पंचामृत से अभिषेक, तुलसी-दल, पीले फूल
  • सत्यनारायण कथा के पाँचों अध्याय
  • ॐ नमो नारायणाय — 108 बार
  • संध्या को उगते चाँद को जल का अर्घ्य; यथाशक्ति अन्न-वस्त्र का दान
3 / 10 · कथा

सत्य ही नारायण

सत्यनारायण कथा में हर पात्र वही भोगता है जो उसने वचन दिया और तोड़ा। कथा कहती है — सत्य ही नारायण है।

इसीलिए यह पूजा किसी माँग से नहीं, वचन निभाने के संकल्प से की जाती है।

4 / 10 · प्रसाद

पंजीरी और केला

पंजीरीसूजी को धीमी आँच पर घी में भूनें, जब तक सोंधी महक न आए; फिर शक्कर और मेवा
साथ मेंकेला, पंचामृत, तुलसी
बाँटनाकम से कम पाँच घरों में — प्रसाद बाँटना ही पूजा पूरी करता है
दादी की सलाह: जल्दबाज़ी का प्रसाद कच्चा रह जाता है।
5 / 10 · पितृपक्ष

सोलह दिन, किस दिन किसका

नियमजिस तिथि को देहांत हुआ, पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध
तिथि न पतासर्व पितृ अमावस्या, 10 अक्टूबर — सबका
सुहागिननवमी (मातृ नवमी)
संन्यासीद्वादशी; शस्त्र-दुर्घटना से गए — चतुर्दशी

स्मृति के अनुसार कुल की परंपरा भिन्न हो सकती है — घर के बड़ों से पूछें।

6 / 10 · तर्पण

तर्पण की विधि

  • प्रातः स्नान; दक्षिण दिशा की ओर मुख
  • जल में काले तिल और सफ़ेद फूल
  • अंजुलि भरकर अंगूठे की ओर से तीन बार धारा — यही पितृ-तीर्थ है
  • ॐ पितृभ्यः नमः; पिता, पितामह, प्रपितामह — और मातृ-पक्ष का भी स्मरण
  • बस इतना। रोज़, सोलह दिन
नदी या तीर्थ संभव न हो तो घर में तांबे के पात्र में गंगाजल मिलाकर — विधि वही।
7 / 10 · श्राद्ध

श्राद्ध के दिन

  • तिल की खीर, उड़द की दाल, कद्दू या लौकी की सब्ज़ी, पूड़ी — सात्विक, बिना लहसुन-प्याज़
  • पहले पंचबलि: गाय, कौआ, कुत्ता, चींटी और देवताओं के लिए अंश अलग
  • ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, दक्षिणा, वस्त्र
  • फिर परिवार खाए — एक समय

जो नहीं जुटा सकें: एक कटोरी खीर कौए के लिए, और एक मुट्ठी अन्न किसी भूखे को — श्राद्ध पूरा।

8 / 10 · सूत्र

जीते-जी सेवा ही पितृ यज्ञ

गृह्य सूत्र स्पष्ट हैं: जीवित माता-पिता और बुज़ुर्गों की सेवा ही सच्चा पितृ यज्ञ है; श्राद्ध उसका विस्तार है।

सपिंडीकरण के बाद दिवंगत “प्रेत” नहीं, “पितृ” है — पितरों की पंक्ति में। संबंध टूटता नहीं; स्मरण और कृतज्ञता बनकर रहता है।

पूरा खंड ऐप के गृह्य सूत्र भाग में: bhojanveda.com/grihya
9 / 10 · क्या टालें

इन सोलह दिनों में

टालेंविवाह की तिथि, गृह-प्रवेश, नया व्यापार, बड़ी ख़रीद — परंपरा से
चलता रहेरोज़ का काम, पढ़ाई, नौकरी, यात्रा — कोई रोक नहीं
भोजनएक समय सात्विक उत्तम; व्रत ऐच्छिक

पितृपक्ष अशुभ काल नहीं है — यह पितरों को समर्पित पखवाड़ा है, इसलिए नए आरंभ उनके बाद।

मधुमेह, गर्भावस्था या दवा पर हों तो उपवास नहीं, केवल सात्विक भोजन। यह चिकित्सा सलाह नहीं है।
10 / 10 · एक नज़र में

सोलह दिन, तीन काम

  • सुबह तिल-जल का तर्पण — दक्षिण मुख, अंगूठे से तीन धारा
  • श्राद्ध की तिथि पर तिल की खीर; पंचबलि; किसी को भोजन
  • घर के बुज़ुर्गों के पास बैठिए — यही असली पितृ यज्ञ है

स्मरण ही श्राद्ध है।

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क्षेत्र और कुल-परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है — तिथि और मुहूर्त की पुष्टि अपने पंचांग या पुरोहित से करें। मधुमेह, गर्भावस्था, या नियमित दवा पर हों तो व्रत से पहले अपने डॉक्टर से पूछ लें; निर्जला व्रत ऐसी स्थिति में न रखें। पूरा व्रत कार्ड — अगली तिथि, रिमाइंडर, मंत्र-जाप: bhojanveda.com/amavasya