प्रदोष व्रत — 24 सितंबर 2026
प्रदोष का फल संध्या में है।
हर मास दो बार, त्रयोदशी तिथि को — शुक्ल और कृष्ण पक्ष में। इस बार गुरुवार पड़ने से यह गुरु प्रदोष है।
दादी की सलाह: “प्रदोष का पूरा फल संध्या में है, दिनभर भूखे रहने में नहीं।”
दस पर्चे। यह व्रत एक संध्या का है — सूर्यास्त से लगभग ढाई घंटे का प्रदोष काल।
प्रदोष का फल संध्या में है।
हर मास दो बार, त्रयोदशी तिथि को — शुक्ल और कृष्ण पक्ष में। इस बार गुरुवार पड़ने से यह गुरु प्रदोष है।
दादी की सलाह: “प्रदोष का पूरा फल संध्या में है, दिनभर भूखे रहने में नहीं।”
समुद्र-मंथन से निकले हलाहल विष को शिव ने त्रयोदशी की संध्या में कंठ में धारण किया — जग बच गया, शिव नीलकंठ हुए।
देवताओं ने उसी प्रदोष काल में उनकी स्तुति की — तभी से यह समय शिव-पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त माना गया।
सूर्यास्त का समय अपने शहर के पंचांग से देखें; सितंबर में उत्तर भारत में लगभग छह-सवा छह बजे।
दिनभर भूखे रहना व्रत का नियम नहीं है — संध्या की पूजा के लिए शरीर में बल रहे, यही नियम है।
घर में शिवलिंग न हो तो शिव-चित्र के सामने कलश के जल से यही क्रम — भाव वही है।
बेल आयुर्वेद में भी औषधि है — कसैला, आँतों को बाँधने वाला। जिसे शिव को चढ़ाते हैं, वही पेट की दवा है।
यही बात प्रदोष को बाक़ी व्रतों से अलग करती है: फल संध्या में मिल गया, रात भूखे नहीं रहना।
समय ही साधना है।
क्षेत्र और कुल-परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है — तिथि और मुहूर्त की पुष्टि अपने पंचांग या पुरोहित से करें। मधुमेह, गर्भावस्था, या नियमित दवा पर हों तो व्रत से पहले अपने डॉक्टर से पूछ लें; निर्जला व्रत ऐसी स्थिति में न रखें। पूरा व्रत कार्ड — अगली तिथि, रिमाइंडर, मंत्र-जाप: bhojanveda.com/pradosh