सामान्य दुर्बलता — थकान, काम में मन न लगना, शक्ति-क्षय।
अन्य नाम: kamjori · कमजोरी · दुर्बलता · शक्तिहीनता · daurbalya · general debility
घरेलू उपाय
मुख्य उपाय
मौसमी: दुर्बल होने पर शरीर में शक्ति बनाये रखने के लिए मौसमी का रस पियें। रस को हल्का गर्म करके 5 बूँद अदरक का रस डालकर पीना अधिक गुणकारी है। अधिक मूत्र आने, दस्तों में तथा भरे पेट मौसमी नहीं लेनी चाहिए।
प्रातः एक भाप का मोदक (चावल-आटे का आवरण, गुड़-नारियल भरन) — तला नहीं, भाप का; स्थायी बल देता है, वर्षा ऋतु का पारंपरिक शक्ति-आहार।
परंपरागत
मशरूम · Mushroom
धूप-दिखाए मशरूम विटामिन-D के गिने-चुने शाकाहारी स्रोतों में हैं, साथ में बी-विटामिन व प्रोटीन — मशरूम-मटर की सब्ज़ी बल लौटाती है।
परंपरागत
मौसमी · Sweet Lemon
एक मौसमी या आधा कप ताज़ा रस दिन के समय लें।
परंपरागत
दालें · Lentils
मूँग या मसूर दाल का पानी, नमक व घी की चुटकी के साथ, दिन में दो बार। रोग के बाद सबसे सुपाच्य आहार।
परंपरागत
मेवे · Nuts
मेवे व खजूर, मुट्ठी भर प्रातः — शीघ्र बल देते हैं।
परंपरागत
अंजीर · Fig
अंजीर दूध में उबालकर रात को, नियम से चार सप्ताह।
परंपरागत
मटर · Green peas
दोपहर के भोजन में एक कटोरी हरे मटर — सस्ता वानस्पतिक प्रोटीन, साथ में बी-विटामिन व लोहा। दुर्बलता में हर भोजन में प्रोटीन किसी भी टॉनिक से अधिक काम करता है।
परंपरागत
अश्वगंधा काढ़ा · Ashwagandha kadha
रात में आधा चम्मच अश्वगंधा गर्म दूध के साथ, छह सप्ताह तक — शास्त्रोक्त बल्य रसायन। यह धीरे बनाता है, इसलिए छह दिन नहीं, छह सप्ताह बाद परखें।
परंपरागत
मोरिंगा चाय · Moringa tea
रोज़ सुबह 1 चम्मच मोरिंगा (सहजन) पत्ती चूर्ण एक कप गुनगुने पानी में — एक सस्ते पत्ते में लोहा, कैल्शियम व प्रोटीन एक साथ। आधा चम्मच से शुरू करें; पूरा चम्मच दस्त कर सकता है।
परंपरागत
इस पन्ने पर प्रमाणित — इस तकलीफ़ में इस चीज़ पर मनुष्यों पर हुए अध्ययन मौजूद हैं। परंपरागत — परंपरा और अनुभव से चला आ रहा — इस तकलीफ़ के लिए आधुनिक प्रमाण सीमित हैं।
यह सब दूसरों के अनुभव, परंपरा और अब तक हुए अध्ययनों का संग्रह है — किसी एक व्यक्ति के लिए दी गई सलाह नहीं। अपने खानपान में कोई भी बदलाव करने से पहले, और ख़ासकर तब जब आप कोई दवा ले रहे हों, अपने आहार विशेषज्ञ या डॉक्टर से पूछ लें।
प्राकृतिक चिकित्सा
ठंडी रगड़-स्नान, सूर्य-स्नान व आठ घंटे निद्रा — इसी क्रम में महत्व।
सौम्य आसन धीरे-धीरे बढ़ाएँ; थकान की सीमा तक न जाएँ।